राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं-संघ की राष्ट्रवादी विचारधारा और मोदी की निर्णायक लीडरशिप ने “NO TO WAR” गैंग को आइना दिखाया है। जानिए कैसे एक वोट बना पाकिस्तान के लिए वॉरनिंग!
राष्ट्रीय सुरक्षा कोई कविता नहीं, शस्त्र और शक्ति का संगम है!
जब सवाल हो राष्ट्र की सीमाओं का, तब विचारधारा का फर्क और भी स्पष्ट हो जाता है। एक तरफ संघ की राष्ट्रवादी सोच है, जो कहती है, “राष्ट्र पहले, बाकी सब बाद में”,और दूसरी तरफ है वो गैंग जो आज भी “NO TO WAR” जैसे पोस्टर लेकर, भारत की वीरता पर उंगली उठाता है।
कभी “NOTA” दबाने में पुण्य देखते थे, अब “NO TO WAR” लिख कर शांति के ठेकेदार बन बैठे हैं। और फिर बोलते हैं, “सब एक जैसे हैं।”
ये भी पढ़ें: The Wire पर बैन: ‘वायर गैंग’ के पीछे की असली ताकत और राष्ट्रविरोध की गहराई
मोदी जी आए और सीधे फॉर्मूला अपनाया: “दवा भी, दंड भी”
अब हालत ये है कि जिनका करियर “NO TO WAR” वाले पोस्टर पकड़ने से शुरू होता है, वही पहले चिल्लाते हैं, “WAR करो”, और जैसे ही पाकिस्तान पर टारगेट लॉक होता है, कहने लगते हैं, “PEACE IS PATRIOTISM”। वाह री राजनीति!
विनोद कापरी हों या नेहा सिंह राठौर, सभी की बोली एक ही स्क्रिप्ट से निकलती है, “हमला करो”, फिर “युद्ध गलत है”, और अंत में “मोदी से सवाल करो”। इनकी राजनीति का एक ही मंत्र है, “मोदी कुछ भी करें, विरोध ज़रूरी है।”
कौन से सब?
वो जिन्होंने सेना को सिर्फ झंडा फहराने तक सीमित कर दिया था या वो जिन्होंने सेना को खुली छूट दी कि पाकिस्तान को घर में घुसकर मारो? जब मोदी पाकिस्तान को दंड देते हैं, तब कुछ लोगों का दर्द उठता है। दर्द ऐसा, जैसे कराची में बुखार और लाहौर में दस्त लग गया हो!
संघ की सोच – आत्मरक्षा, आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव
संघ का राष्ट्रवाद “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से जुड़ा है, लेकिन जब परिवार में कोई घुसपैठिया घुस आए, तो उसे बाहर फेंकना भी उतना ही जरूरी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं – यही वो मंत्र है जो मोदी ने अपनाया, और हर राष्ट्रभक्त भारतीय ने सर आंखों पर रखा। यही वो फर्क है जो कांग्रेस और भाजपा को अलग करता है।
जहां एक विचारधारा कहती है, “शांति सबसे ऊपर,”वहीं संघ की सोच कहती है, “शांति की रक्षा के लिए शक्ति जरूरी है।”
NO TO WAR गैंग: आज की सबसे बड़ी ट्रैजेडी
ये वही लोग हैं जो कभी टीवी पर चिल्लाते थे, “हमारे प्रधानमंत्री कमजोर हैं” और जब मोदी पाकिस्तान पर कार्यवाही करते हैं, तो कहते हैं, “युद्ध से कुछ हासिल नहीं होगा।”
इनकी स्थिति उस कैच-22 में फंसी हुई है – मोदी चुप रहें तो इन्हें तकलीफ, और मोदी एक्शन लें तो इन्हें घबराहट। शांति का भाषण देने वाले ये लोग शांति के नाम पर राष्ट्रहित से समझौता चाहते हैं, और यही वह बिंदु है जहां संघ की विचारधारा उन्हें चुभती है।
वोट की ताकत – राष्ट्र का रक्षक या तमाशबीन?
हर वोट जो राष्ट्रवाद के साथ जाता है, वह सिर्फ सरकार नहीं बनाता – वह सीमा पर खड़े जवान के हाथ में ताकत, आंख में विश्वास और पीठ पर देश की ढाल बनकर जाता है। जो कहते हैं “No to War”, वो दरअसल “Yes to Weakness” बोल रहे हैं और जो कहते हैं “सब एक जैसे हैं”, उन्हें राफेल की गड़गड़ाहट और S-400 की गरिमा सुनाई नहीं देती।
राष्ट्रवाद कोई टीवी डिबेट की स्क्रिप्ट नहीं, वह शहीदों के खून से लिखी गई ज़िम्मेदारी है। संघ की राष्ट्रवादी विचारधारा और मोदी की निर्णायक नीति से देश आज न केवल सुरक्षित है, बल्कि गर्व से सिर उठाकर खड़ा है।
तो अगली बार जब कोई कहे – “No to War”, तो बस इतना पूछना – “तुम किसकी तरफ हो – भारत की या पाकिस्तान की?

