RSS Centenary (शताब्दी): डॉ. हेडगेवार का सेवा और समरसता आधारित चिंतन, आज के भारत के लिए प्रेरणा

RSS Centenary (शताब्दी): डॉ. हेडगेवार का सेवा और समरसता आधारित चिंतन, आज के भारत के लिए प्रेरणा

सेवा, समर्पण और समरसता का शताब्दी संगम (RSS Centenary, Hedgewar philosophy, संघ और सामाजिक समरसता)

2025 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी शताब्दी यात्रा के एक ऐतिहासिक पड़ाव पर खड़ा है। यह अवसर केवल एक संगठन की उम्र गिनने का नहीं, बल्कि उसके संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की उस विचारधारा को समझने का है, जिसकी नींव में सेवा, समर्पण और सामाजिक समरसता की भावना थी।

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हेडगेवार का दृष्टिकोण:  सिर्फ हिंदुत्व नहीं, संस्कृति का उत्थान

डॉ. हेडगेवार ने 1940 में अपनी मृत्यु से पहले स्पष्ट कर दिया था कि RSS किसी संकीर्ण धार्मिक एजेंडे पर आधारित संगठन नहीं होगा। वे हिंदुत्व की रक्षा से अधिक भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को प्राथमिकता देते थे। उनका उद्देश्य किसी धर्म विशेष को ऊपर उठाना नहीं, बल्कि एक समरस और सामाजिक रूप से संतुलित भारत की रचना करना था।

समाज सेवा बनाम सत्ता राजनीति (Hedgewar philosophy)

हेडगेवार ने किसी राजनीतिक दल या चुनावी मंच को संघ के कार्यक्षेत्र से दूर रखा। उन्होंने गरीबों, छात्रों, अनाथ बच्चों और समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों को प्राथमिकता दी। वे मानते थे कि राजनीतिक दल समाज सेवा की बजाय सत्ता का माध्यम बन चुके हैं।

उन्होंने कभी किसी राजनीतिक चंदा या लोकप्रिय चेहरों के सहारे संघ को खड़ा नहीं किया। उन्होंने शिक्षकों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की फौज तैयार की।

समरसता बनाम वर्ग संघर्ष (डॉ. हेडगेवार विचारधारा व RSS सेवा कार्य)

हेडगेवार की सोच, बी.आर. अंबेडकर और वामपंथी दलों की उस विचारधारा से भिन्न थी, जिसमें सामाजिक सुधार का आधार वर्ग संघर्ष था। संघ ने ‘समरसता’ को मूलमंत्र माना यानी जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र या संप्रदाय के भेदों को मिटाकर सबको जोड़ने का प्रयास।

M.S. गोलवलकर के नेतृत्व में अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान ने संघ को सामाजिक न्याय की दिशा में ठोस कार्यकर्ता संगठन के रूप में स्थापित किया। 1974 में बालासाहेब देवरस ने साफ कहा, “अस्पृश्यता को गोली मारो, किताबों में भी नहीं रहनी चाहिए।” यह केवल बयान नहीं था, बल्कि व्यवहारिक अभियान की शुरुआत थी।

डॉ. हेडगेवार की निष्कलंक विरासत

हेडगेवार ने हिंदुत्व को एक विविधताओं से भरी संस्कृति के रूप में देखा। वे द्वैध सोच से दूर रहे, जहां एक ओर मुस्लिम समाज की कड़वाहट से बचते रहे, वहीं हिंदू समाज की कुरीतियों की आलोचना भी बिना झिझक की।

उन्होंने कभी भी हिंदुत्व को राजनीतिक हथियार नहीं बनाया। न ही उन्होंने स्वयं को राजनीति की धारा में बहने दिया। यही वजह है कि 100 वर्षों बाद भी संघ न केवल जीवित है, बल्कि विचारों के स्तर पर सबसे संगठित आंदोलन बन चुका है।

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आज के संदर्भ में क्यों प्रासंगिक है हेडगेवार का चिंतन

आज जब सामाजिक ध्रुवीकरण और जातिगत राजनीति अपने चरम पर है, हेडगेवार की सोच हमें बताती है कि संघर्ष नहीं, समरसता ही राष्ट्र निर्माण का आधार हो सकती है। उनके लिए राष्ट्र किसी झंडे या प्रतीक से अधिक था, राष्ट्र था लोगों की चेतना, सेवा भावना और आपसी संबंधों में रचा-बसा।

संघ और सामाजिक समरसता में सदी बाद भी प्रासंगिक हैं हेडगेवार

डॉ. हेडगेवार का व्यक्तित्व किसी संगठन का सिर्फ संस्थापक नहीं, एक चेतना के जनक का था। 2025 में RSS की शताब्दी केवल आंकड़ों का उत्सव नहीं, बल्कि उन मूल विचारों की पुनर्पुष्टि का पर्व होना चाहिए, जो सेवा, अनुशासन, समरसता और राष्ट्र के लिए समर्पण पर आधारित हैं।

जो लोग RSS की आलोचना करते हैं, उन्हें भी हेडगेवार के उस आत्मनिष्ठ चिंतन से परिचित होना चाहिए, जिसने सत्ता नहीं, सेवा को संगठन का केंद्र बिंदु बनाया।

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