बिहार की राजनीति 2025:  ‘जान का खतरा’ बनाम ‘राजनीतिक खतरा’: भावनात्मक कार्ड या मनगढ़ंत ड्रामा?

बिहार की राजनीति 2025: ‘जान का खतरा’ बनाम ‘राजनीतिक खतरा’: भावनात्मक कार्ड या मनगढ़ंत ड्रामा?

पटना, जुलाई 2025:  बिहार की राजनीति इन दिनों नाटकीय मोड़ पर है। एक तरफ जन अधिकार पार्टी के प्रमुख पप्पू यादव दावा कर रहे हैं कि अगर तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्हें राज्य छोड़कर भागना पड़ सकता है या उनकी जान को खतरा हो सकता है। वहीं दूसरी ओर तेजस्वी यादव की मां और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का बयान आया कि उनके बेटे की जान को पहले ही चार बार खतरा हो चुका है।

अब सवाल उठता है कि यह सब वाकई खतरे की चेतावनी है या चुनावी रण में इमोशनल इंजेक्शन?

“राजनीति में भावनात्मक कार्ड” का पुराना फॉर्मूला

राजनीति में ‘जान को खतरा’ जैसी बातें कोई नई नहीं हैं। जब भी मुद्दों पर पकड़ कमजोर होती है या जब जनसरोकारों से ध्यान भटकाना होता है, तो नेताओं को साजिशों की हवा महसूस होने लगती है।

राबड़ी देवी ने विधान परिषद के बाहर तेजस्वी की सुरक्षा बढ़ाने की मांग की। उन्होंने नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी पर हमला करते हुए कहा कि उनके बेटे की जान खतरे में है। पर विडंबना देखिए बिहार के जिन नेताओं पर कभी अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप लगता रहा, अब वही नेता अपने बच्चों को सिस्टम से असुरक्षित बता रहे हैं।

पप्पू यादव का डर या राजनीतिक संकेत?

पप्पू यादव जैसे नेता, जो खुद को जनता का सच्चा सेवक बताते हैं, वे क्यों यह कह रहे हैं कि तेजस्वी यादव की सरकार आई तो उन्हें जान बचाकर भागना होगा? क्या यह सत्ता से बाहर होने का डर है या किसी अनदेखे गठजोड़ की संभावना की भनक? यह वही पप्पू यादव हैं जो कभी लालू प्रसाद के करीब थे, फिर विपक्ष की ताकत बने, और अब ‘डर’ की राजनीति का हिस्सा?

माफिया के कब्जे वाले दौर का वारिस, अब डर का शिकार?

राबड़ी देवी के मुताबिक तेजस्वी यादव की जान को खतरा है। पर सवाल यह भी है कि जिस पिता (लालू यादव) के दौर में बिहार के लगभग सारे माफिया सिस्टम के इर्द-गिर्द घूमते थे, उसी दौर की विरासत को आगे ले जा रहे तेजस्वी को कौन हाथ लगाने की हिम्मत करेगा?

राजनीति का ये नया दौर अब यह साबित कर रहा है कि डिग्री फेल हो या पास, डराने की राजनीति सबको आती है।

वोटर पुनरीक्षण 2025 के डर से अचानक इस डर वाले ड्रामे का माहौल हावी

बिहार में बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग जैसे मुद्दे अब शायद नेताओं की प्राथमिकता में नहीं हैं। उसके बजाय अब “कौन किससे डरा”, “किसकी जान को खतरा” और “कौन ज्यादा मासूम,” इस सियासी स्क्रिप्ट का हिस्सा बन चुके हैं। विपक्ष अपने लिए खतरा बता रहा है, सत्ता पक्ष विपक्ष के लिए खतरा बता रहा है और जनता दोनों के बयानबाजी की नौटंकी देख रही है।

दरअसल यह डर नहीं, इनका राजनीतिक ‘ड्रामा’ है!

बिहार की राजनीति अब ‘भावनात्मक सहानुभूति’ की मिर्ची में कटाक्ष के तड़के के साथ पकाई जा रही है। किसी को सत्ता से डर है, तो किसी को सिस्टम से। लेकिन बिहार की जनता अब सब जानती है कि यह ‘खतरा राजनीति’ दरअसल जनता से असली मुद्दों को छिपाने का खेल है। और सवाल अब यह नहीं कि किसे खतरा है, बल्कि यह है कि बिहार की जनता को मनगढ़ंत मुद्दों से कब तक दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया जाएगा?

लेखक :  नवनीत आनंद, पोलिटिकल एनालिस्ट

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