आतंकी हमले पर सरकार की प्रतिक्रिया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली, ऑपरेशन सिंदूर, विपक्ष की राजनीति
जब देश सुरक्षा के मोर्चे पर आतंकवादियों को मुँहतोड़ जवाब दे रहा हो, तब अगर किसी की नींद उड़ जाए तो समझिए या तो वो दुश्मन है… या विपक्ष! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली और ऑपरेशन सिंदूर की सटीक कार्रवाई के बाद जिस तरह से विपक्ष बौखलाया, वह किसी राजनीतिक व्यंग्य का विषय नहीं बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी से भागने का दस्तावेज है, साथ ही साथ आतंकी हमले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की प्रतिक्रिया भी है।
मोदी की रैली से विपक्ष को एलर्जी क्यों?
मोदी की रैली जैसे ही तय समय पर हुई, विपक्ष ने कैमरे पकड़ लिए और संवेदनशीलता का ढोंग रच दिया। सवाल ये उठता है कि क्या एक लोकतांत्रिक देश में प्रधानमंत्री का जनता से संवाद करना अपराध हो गया है? क्या चुनावी प्रक्रिया को आतंकी घटनाओं के नाम पर रोक दिया जाए? विपक्ष को ये समझना होगा कि प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी सिर्फ भाषण देना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास का संतुलन बनाए रखना भी है।
ऑपरेशन सिंदूर: बात नहीं, कार्रवाई की सरकार
पहलगाम में आतंकी हमले के तुरंत बाद सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया – जिसमें भारतीय सेना ने पाकिस्तान और POK के आतंकी ठिकानों पर सटीक हमला किया। लेकिन विपक्ष की नजरों में यह कार्रवाई गौण हो गई क्योंकि उनकी निगाहें सिर्फ मोदी की रैली पर टिकी थीं।
क्या यही राजनीतिक प्राथमिकता है? जहाँ राष्ट्र की सुरक्षा से ज़्यादा अहमियत मंच की तारीख को दी जाए?
इस दौरे में बिहार के विकास कार्यों की समीक्षा भी की गई, लेकिन विपक्ष को केवल माइक और भीड़ दिखी। शायद उन्हें डर है कि अगर देश को विकास की असली तस्वीर दिख गई, तो उनकी राजनीति का रंग फीका पड़ जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ चुनाव प्रचार के लिए नहीं, बल्कि विकास और सुरक्षा दोनों के एजेंडे को लेकर मैदान में हैं। विपक्ष की परेशानी यही है – एक नेता जो मंच से नहीं, मैदान से जवाब देता है।
“घुस के मारेंगे”: यह सिर्फ बयान नहीं, नीति है
जब प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार की धरती से आतंकवादियों को सीधा संदेश दिया, “हम घुस के मारेंगे”, तो दुनिया ने सुना। लेकिन विपक्ष ने उसमें भी राजनीति तलाश ली। उनके लिए ये बयान भी ‘चुनावी स्टंट’ बन गया।
क्या देश की सुरक्षा को लेकर प्रधानमंत्री की दृढ़ता पर सवाल उठाना, विपक्ष की राजनीतिक दरिद्रता नहीं?
राजनीति करें, लेकिन राष्ट्रहित को न भूलें!
विपक्ष की राजनीति अब उस खोए हुए खिलाड़ी जैसी हो गई है जो हर बार हारकर अंपायर को दोष देता है। जब देश आतंक से लड़ रहा हो, तब रैली पर रोना और बयानबाजी करना ये दिखाता है कि विपक्ष अभी भी मुद्दों की राजनीति करने को तैयार नहीं है।
मोदी की रैली और ऑपरेशन सिंदूर, दोनों ने एक ही संदेश दिया: “हम डरते नहीं, लड़ते हैं और जीतना जानते हैं।”
संपादक: नवनीत आनंद — भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता, संघ विचारधारा समर्थक

