The Wire पर बैन : देशविरोधी नैरेटिव और विदेशी फंडिंग का खुलासा, जानिए ‘वायर गैंग’ की असली ताकत और इसकी राष्ट्रविरोधी जड़ें
The Wire पर बैन सिर्फ एक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक विचारधारा के नेटवर्क का पर्दाफाश है। जानिए कैसे वामपंथी एक्टिविस्ट, विदेशी फंडिंग और ऊँचे पदों पर बैठे प्रभावशाली लोग भारत विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाते रहे हैं। यह लेख आपकी आंखें खोल देगा!
भारत सरकार ने वामपंथी मीडिया आउटलेट ‘द वायर’ पर भारत विरोधी रिपोर्टिंग के चलते प्रतिबंध लगा दिया है। भारत सरकार द्वारा ‘The Wire’ पर बैन लगाने के बाद यह सवाल उठता है कि आखिर ‘वायर गैंग’ की ताकत क्या है? जानिए इस नेटवर्क के पीछे के लोग, विदेशी फंडिंग और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का पूरा सच।
The Wire पर बैन: एक राष्ट्रविरोधी नेटवर्क का पर्दाफाश
भारत सरकार ने हाल ही में वामपंथी विचारधारा वाले मीडिया प्लेटफॉर्म The Wire पर भारत विरोधी रिपोर्टिंग के चलते प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है। यह कोई साधारण मीडिया संस्थान नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रभावशाली नेटवर्क का हिस्सा है, जिसे देश विरोधी गतिविधियों को वैचारिक समर्थन और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग प्राप्त होती रही है।
बस्तर, नक्सल और ‘सलवा जुडूम’ का सच
2010 में छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में माओवादियों ने 76 सीआरपीएफ जवानों की हत्या की। इसके बाद JNU जैसे संस्थानों में इस पर जश्न जैसा माहौल देखा गया।
इससे पहले 2006 में कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा ने सलवा जुडूम नामक आंदोलन की शुरुआत की, जिसमें स्थानीय लोगों को नक्सलियों से लड़ने के लिए तैयार किया गया।
लेकिन 2007 में नंदिनी सुंदर नाम की प्रोफेसर ने सुप्रीम कोर्ट में एक PIL दाखिल की और 2011 में कोर्ट ने सलवा जुडूम पर रोक लगा दी – उस समय जब यह आंदोलन नक्सलियों पर दबाव बना रहा था।
2013 में नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा की हत्या कर दी। उन्हें 78 बार चाकू मारा गया – यह घटना देश को झकझोर देने वाली थी।
नंदिनी सुंदर: राष्ट्रविरोधी रुझानों की प्रतिनिधि?
नंदिनी सुंदर केवल एक प्रोफेसर नहीं हैं। 2016 में उन्होंने “ऋचा केशव” नाम से फर्जी पहचान के साथ बस्तर का दौरा किया और स्थानीय लोगों ने आरोप लगाए कि उन्होंने गांववालों को नक्सलियों का समर्थन करने और सरकार के खिलाफ भड़काया।

उन पर हत्या के आरोप लगे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला कमजोर पड़ा क्योंकि मृतक की पत्नी ने बयान बदल दिया।
वायर गैंग की ताकत: फोर्ड फाउंडेशन, टाटा और इन्फोसिस से फंडिंग?
नंदिनी सुंदर के माता-पिता — पुष्पा सुंदर और संजीवी सुंदर — दोनों ही ऊंचे पदों पर रह चुके IAS अधिकारी थे। पुष्पा सुंदर ने फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से NFI की स्थापना की, जो कई हिंदू-विरोधी गतिविधियों से जुड़ा रहा है।
रोचक तथ्य (Interesting Facts):
- रतन टाटा 1994-2006 तक फोर्ड फाउंडेशन के ट्रस्टी रहे।
- नारायण मूर्ति भी इसके ट्रस्टी रह चुके हैं।
- नंदिनी को 2010 में इन्फोसिस पुरस्कार मिला।
पुष्पा सुंदर के दामाद सिद्धार्थ वरदराजन — The Wire के संस्थापक — को फोर्ड और टाटा जैसे उद्योगपतियों से सीधे तौर पर भारी फंडिंग मिली:
- टाटा: ₹1.64 करोड़
- मूर्ति: ₹1 करोड़
- नीलकणी (Infosys): ₹12.2 करोड़
सिद्धार्थ वरदराजन की पृष्ठभूमि और विदेशी कनेक्शन
सिद्धार्थ वरदराजन के पिता मुथुसामी वरदराजन ब्रिटिश राज में उच्च पुलिस अधिकारी रहे। वे बाद में लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में मंत्री बने। सिद्धार्थ की अमेरिकी नागरिकता भी सवालों के घेरे में है – आरोप है कि यह ‘Anchor Baby’ योजना के तहत प्राप्त की गई।
उनके भाई टुंकु वरदराजन के पास ब्रिटिश नागरिकता है और वे भी वामपंथी विचारों के समर्थक माने जाते हैं।
The Wire पर बैन सिर्फ शुरुआत है
The Wire का मामला यह दिखाता है कि किस तरह विचारधारात्मक नेटवर्क, विदेशी फंडिंग और नौकरशाही की मिलीभगत से भारत विरोधी नैरेटिव को हवा दी जाती रही है।
यह सिर्फ एक मीडिया हाउस नहीं, बल्कि एक विचारधारा आधारित अभियान है — जो न्यायपालिका, शिक्षा, एनजीओ और मीडिया के माध्यम से देश की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है।

