संजय सिंह की राजनीति

आस्था पर हमला या राजनीति का शोर? राम नाम को ‘हराम’ से जोड़कर घिरी संजय सिंह की राजनीति!

OPINION : तेज आवाज, ऊँचे सुर और शब्दों की चिचियाहट, इसी को अगर वैचारिक भाषण समझ लिया जाए तो फिर खामोशी भी क्रांति कहलाने लगे। आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह इसी भ्रम के सबसे बड़े उदाहरण बनते जा रहे हैं। मंच मिले या माइक, संसद हो या कैमरा; तेज बोलना ही अगर विचार होता, तो लाउडस्पीकर सबसे बड़ा दार्शनिक होता।

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राम नाम को हराम से जोड़कर क्या संजय सिंह ने साबित की सनातनी नफरत?

हालिया बयान में राम के नाम के साथ ‘हराम’ जैसे शब्दों का प्रयोग कोई जुबान फिसलने की दुर्घटना नहीं, बल्कि उसी वैचारिक धारा की स्वाभाविक उपज है जो सनातन को देखकर असहज और आस्था को देखकर एलर्जिक हो जाती है। एक नेता होकर अगर शर्म नहीं आई, तो आश्चर्य नहीं, क्योंकि जहां वैचारिक रीढ़ ही न हो, वहां लज्जा टिकती भी नहीं।

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पहले भी आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह अपनी खोखली विचारधारा का देते रहे हैं सबूत

इतिहास की खिड़की खोलकर देखें तो यह यात्रा टिकट ब्लैकिए से शुरू होकर हाथ में झाड़ू पकड़े जेएनयू की गलियों तक जाती है, जहां देशविरोधी नारों पर ताली बजती है और ‘असहमति’ के नाम पर हर मर्यादा कुचली जाती है। तब्लीगी जमात का जिन्न जब दिल्ली दंगों में बाहर आता है, तब भी यह धारा मौन साध लेती है, क्योंकि चयनात्मक आक्रोश ही इनका स्थायी चरित्र रहा है।

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बेबुनियादी आरोप प्रत्यारोप से पटा पड़ा है संजय सिंह का छोटा राजनीतिक जीवन

संघ कार्यालय में तिरंगा नहीं फहराने पर संसद में चिचियाना आसान है, लेकिन किसान आंदोलन में खालिस्तानी झंडे लहराने पर चुप्पी साध लेना भी उसी वैचारिक पाठ्यक्रम का हिस्सा है। जबकि संघ कार्यालय में तिरंगा नहीं फहराने की जिम्मेदार खुद कांग्रेस द्वारा लागू किया गया कानून था। कोरोना जैसी महामारी में सिलेंडर ब्लैक करने की फुर्सत न हो, और फिर राष्ट्रभक्ति पर भाषण – यह विडंबना नहीं, वैचारिक विघटन है।

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वैचारिक सुविधा ढूंढ़ते रहते हैं उलटी विचारधारा के संजय सिंह जैसे नेता

जो शाहीन बाग की पटकथा लिखने में गुरेज न करें, उन्हें आजादी के आंदोलन में क्रांतिकारी शहीद ढूंढने की जरूरत क्यों आन पड़ी – यह सवाल नहीं, मजाक है। और जिनके दल का मुखिया दिल्ली में मुंह की खाकर पंजाब में राजनीतिक रईसी झाड़ता हो, उन्हें तिरंगे से ज़्यादा बुर्के पर बहस शोभा देती है, कम से कम वहां वैचारिक सुविधा तो रहती है।

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तेज आवाज को विचार और शोर को साहस समझना इनका वैचारिक दिवालियापन

असल गलती इन नेताओं की नहीं है। गलती उन लोगों की है जो तेज़ आवाज को विचार और शोर को साहस समझ बैठते हैं। जिनके भीतर ‘क्रांतिकारी’ बनने का बीज बिना अध्ययन, बिना संस्कार और बिना जिम्मेदारी के अंकुरित होने को बेताब रहता है। क्योंकि जब वैचारिक दिवालियापन हो, तो चिल्लाना ही सबसे आसान राजनीति बन जाता है।

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