देशभक्ति और मीडिया एजेंडा पर व्यंग्यात्मक लेख, भारत में वामपंथी मीडिया का राष्ट्रवाद विरोधी एजेंडा, भारतीय मीडिया में वामपंथी सोच का प्रभाव, राष्ट्रवादी नजरिए से मीडिया की आलोचना, राष्ट्रवादी विचारधारा पर वामपंथी पत्रकारों के हमले

वामपंथी मीडिया और एजेंडा पत्रकारिता पर राष्ट्रवादी व्यंग्य: देश को कमजोर करने की रणनीति

देश की मीडिया पर लांछन: वामपंथ की पुरानी रणनीति (देशभक्ति और मीडिया एजेंडा पर व्यंग्यात्मक लेख)

कभी-कभी लगता है कि भारत से बड़ा कोई सस्पेंस थ्रिलर सीरियल इस दुनिया में नहीं हो सकता। रोज़ सुबह अख़बार पढ़िए या टीवी ऑन कीजिए, ऐसा लगेगा जैसे देश नहीं, ‘क्राइम थ्रिलर’ है – जिसमें सरकार विलेन है, सेना कातिल है और राष्ट्रभक्ति एक पाखंड है। और इस धारावाहिक के निर्माता-निर्देशक? हमारे परम पूज्य ‘वामपंथी चिंतक’ और उनके चिर-परिचित पत्रकार!

‘सवाल पूछना लोकतंत्र है’ या ‘राष्ट्रविरोधी सुविधाजनक बहाना’?

अब भला बताइए, देश की सीमाओं पर सेना शहीद हो रही है, लेकिन बहस इस बात पर है कि ‘सरकार ने कोई चाय क्यों नहीं भेजी?’ चीन सीमा पर अतिक्रमण हो या कश्मीर में आतंकवाद, हमारे वामपंथी मित्र तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के सरकार से सवाल करते हैं – “क्यों नकारात्मकता फैल रही है?” और फिर रात को उसी सवाल को ‘प्राइम टाइम का प्रमुख मुद्दा’ बना देते हैं।

पत्रकारिता या प्रोपेगेंडा:  आज के मीडिया से लताड़े जा चुके एजेंडधारियों की हकीकत

जब भी देश मजबूत हो, मीडिया को कमजोर करना जरूरी होता है – यही है इनकी ‘क्रांतिकारी रणनीति’। वामपंथी विचारधारा के ध्वजवाहक कहते हैं, “सवाल पूछना लोकतंत्र की आत्मा है।” बिल्कुल सही! लेकिन जब सवाल राष्ट्र के खिलाफ एजेंडा बन जाए, जब हर जवाब में “RSS”, “भगवा आतंक”, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन” और “संविधान खतरे में है” जैसा पॉपकॉर्न डाला जाए – तब समझ लीजिए कि पत्रकारिता की चाय में ‘एजेंडा का दूध’ मिलाया जा चुका है।

राष्ट्रवाद का डर:  वामपंथी चिंतन का असली सच

इन्हें पाकिस्तान की रोटियां सुपाच्य लगती हैं, लेकिन भारत की मिसाइलें ‘फासीवाद’ की निशानी लगती हैं। जैसे ही कोई राष्ट्रभक्त युवा सोशल मीडिया पर राष्ट्रगान गाकर वीडियो डालता है, एक लंबा आर्टिकल आता है – “क्या देशभक्ति एक जबरदस्ती है?” जैसे ही सेना कोई जवाबी कार्रवाई करती है, तुरंत स्टूडियो में बहस छिड़ती है – “क्या सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत है?” जैसे ही देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ती है, वो कहते हैं – “GDP एक पूंजीवादी छलावा है।” और जैसे ही प्रधानमंत्री विदेशी दौरे पर जाते हैं, मीडिया का मर्म होता है – “क्या ये विदेश नीति या प्रचार है?”

 

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जब देश आगे बढ़ता है, मीडिया से लताड़े हुए एजेंडाधारी क्यों बिलबिलातें हैं?

देश आगे बढ़े तो इनकी टीआरपी घटती है। राष्ट्र सुरक्षित हो तो इनकी विचारधारा संकट में आ जाती है। इनकी पत्रकारिता की पाठशाला में ‘देश’ एक उपेक्षित विषय है और ‘अलगाववाद’ एक प्रोजेक्ट फाइल! इनकी कलम लोकतंत्र के नाम पर संविधान को चीथड़ा कर देती है, लेकिन फिर भी ये खुद को ‘लोकतंत्र के रखवाले’ कहते हैं और सबसे दिलचस्प बात ये है कि – जब इन्हें कोई जवाब न मिले तो तुरंत कह देते हैं: “हम अर्बन नक्सल नहीं हैं!”

राष्ट्रवाद बनाम नकारात्मक नैरेटिव

अब आइए सोचें – ये लांछन लगाते किस पर हैं? उस मीडिया पर जो सेना के साथ बॉर्डर पर जाता है, या उस रिपोर्टर पर जो देश के गांवों में जाकर लोगों की असली कहानी दिखाता है? नहीं! इनका गुस्सा उस पर है जो भारत को ‘भारत माता’ कहने की हिम्मत करता है। वामपंथियों को सच में बहुत डर लगता है उस विचारधारा से जो ‘संस्कृति’, ‘सनातन’, ‘राष्ट्र’ और ‘धर्म’ की बात करती है। क्योंकि इन्हें आदत पड़ी है ‘तोड़ो’, ‘बांटो’, ‘झूठ फैलाओ’ और फिर कहो–“हमें बोलने नहीं दिया जा रहा!”

प्राइम टाइम की एजेंडा फैक्ट्री

अब सवाल ये है कि क्या हमें इनको जवाब देना चाहिए? उत्तर एक ही है – नहीं! क्योंकि राष्ट्रवाद को बहस की नहीं, संकल्प की ज़रूरत होती है,  क्योंकि देशभक्ति को प्राइम टाइम नहीं, जनमानस का समय चाहिए और क्योंकि वामपंथी पत्रकारों की रिपोर्टिंग को गंभीरता से लेना वैसा ही है जैसे ‘मच्छर भगाने वाली क्वॉइल से AC चलाना’।

राष्ट्रवादी जवाब: न बहस, बस संकल्प

जिस दिन जनता समझ गई कि ‘एंकर की लच्छेदार उलझी आवाज़ देश की सच्चाई नहीं होती’, उसी दिन वामपंथी मीडिया की पूर्णतः दुकान बंद हो जाएगी, यूं तो लगभग बंद हो ही चुकी है; तब तक, राष्ट्रवादी विचारधारा को चाहिए – हंसते रहो, व्यंग्य करते रहो और सच्चाई को उजागर करते रहो।

जय हिंद! जय भारत!

संपादक: नवनीत आनंद — भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता, संघ विचारधारा समर्थक

 

 

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